विजय के समर्थन पर सस्पेंस, CPI गठबंधन शुक्रवार को करेगा ऐलान
चेन्नई: तमिलनाडु विधानसभा चुनाव के परिणाम आने के बाद भी सत्ता का भविष्य धुंधला बना हुआ है। चार मई को आए नतीजों ने किसी भी दल को पूर्ण बहुमत नहीं दिया, जिससे राज्य में 'हंग असेंबली' जैसी स्थिति पैदा हो गई है। थलापति विजय की पार्टी 'तमिलगा वेट्ट्री कज़गम' (टीवीके) सबसे बड़े दल के रूप में उभरने के बावजूद अब तक सरकार बनाने के लिए आवश्यक जादुई आंकड़े को छूने में नाकाम रही है। आज राजभवन में राज्यपाल राजेंद्र विश्वनाथ अर्लेकर और विजय के बीच हुई मुलाकात के बाद यह स्पष्ट हो गया है कि केवल दावों के आधार पर शपथ ग्रहण संभव नहीं है और बहुमत का ठोस प्रमाण देना अनिवार्य होगा।
राजभवन की सख़्ती और बहुमत का पेच
लोक भवन द्वारा जारी आधिकारिक विज्ञप्ति के अनुसार, राज्यपाल राजेंद्र विश्वनाथ अर्लेकर ने टीवीके प्रमुख विजय को स्पष्ट संदेश दे दिया है कि उनके पास वर्तमान में सरकार चलाने के लिए जरूरी संख्या बल मौजूद नहीं है। हालांकि टीवीके ने कांग्रेस के विधायकों का समर्थन पत्र सौंपकर सरकार बनाने की इच्छा जताई है, लेकिन 234 सदस्यीय सदन में यह गठबंधन अभी भी बहुमत की रेखा से दूर खड़ा है। राज्यपाल का मानना है कि तमिलनाडु जैसे महत्वपूर्ण राज्य में अस्थिरता को जगह नहीं दी जा सकती, इसलिए जब तक 118 विधायकों का लिखित और प्रत्यक्ष समर्थन नहीं मिल जाता, तब तक नई सरकार के गठन पर सस्पेंस बरकरार रहेगा।
वामपंथी दलों और वीसीके के रुख पर टिकी निगाहें
सत्ता के इस संघर्ष में अब छोटी पार्टियों की भूमिका निर्णायक हो गई है। सीपीआई नेता वीरपांडियन ने पुष्टि की है कि विजय ने उनसे एक प्रगतिशील सरकार बनाने के लिए समर्थन मांगा है, जिस पर फैसला लेने हेतु शुक्रवार को पार्टी की राज्य कार्यकारी समिति की आपातकालीन बैठक बुलाई गई है। दूसरी ओर, वीसीके प्रमुख थोल थिरुमावलवन ने भी राज्यपाल से मुलाकात कर विजय को सदन में शक्ति परीक्षण का मौका देने की वकालत की है। वीसीके ने संकेत दिए हैं कि वे समर्थन के अनुरोध पर जल्द ही अपनी स्थिति स्पष्ट करेंगे, जिससे आने वाले 24 घंटे राज्य की राजनीति के लिए बेहद महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं।
गठबंधन की राजनीति और बाहरी हस्तक्षेप के आरोप
जैसे-जैसे सरकार गठन की प्रक्रिया लंबी खिंच रही है, राज्य में राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप का दौर भी तेज हो गया है। वीसीके प्रमुख थिरुमावलवन ने सीधे तौर पर भारतीय जनता पार्टी पर राज्य की राजनीति में अनुचित हस्तक्षेप करने और भ्रम की स्थिति पैदा करने के गंभीर आरोप लगाए हैं। उनका कहना है कि देरी के पीछे कहीं न कहीं बाहरी दबाव काम कर रहा है। इधर, सीपीआई ने स्पष्ट किया है कि एमके स्टालिन के साथ उनकी हालिया मुलाकात केवल शिष्टाचार थी, लेकिन टीवीके के साथ जाने या न जाने का फैसला पूरी तरह से पार्टी की आंतरिक बैठक के बाद ही लिया जाएगा, जिससे यह साफ है कि सत्ता की चाबी अभी भी समझौतों के पिटारे में बंद है।
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