MVA में 'अविश्वास' की एंट्री: उद्धव सेना की जिद और कांग्रेस की अकड़, क्या टूट जाएगा विपक्षी गठबंधन का किला?
मुंबई/दिल्ली: महाराष्ट्र की राजनीति में 12 मई, 2026 को होने वाले विधान परिषद के 9 सीटों के चुनाव ने विपक्षी गठबंधन महाविकास आघाडी के भीतर खींचतान बढ़ा दी है। गठबंधन सहयोगियों, विशेषकर कांग्रेस और शरद पवार की एनसीपी (SP) की पुरजोर मांग के बावजूद उद्धव ठाकरे ने पुन: एमएलसी बनने से इनकार कर दिया है। शिवसेना (UBT) द्वारा अंबादास दानवे को अचानक उम्मीदवार बनाए जाने से कांग्रेस नेतृत्व ने इसे 'विश्वासघात' करार दिया है।
कांग्रेस की नाराजगी की मुख्य वजह: "बिना चर्चा के लिया फैसला"
कांग्रेस नेताओं का तर्क है कि गठबंधन के भीतर यह स्पष्ट था कि यदि उद्धव ठाकरे खुद चुनाव लड़ते हैं, तो कांग्रेस उनका बिना शर्त समर्थन करेगी।
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एकतरफा घोषणा: कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष हर्षवर्धन सपकाल और विजय वडेट्टीवार का आरोप है कि शिवसेना (UBT) ने अंबादास दानवे के नाम की घोषणा करने से पहले सहयोगियों से कोई चर्चा नहीं की।
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कांग्रेस का दावा: वडेट्टीवार ने सवाल उठाया कि राज्यसभा की सीट शरद पवार को मिली और अब परिषद की सीट शिवसेना (UBT) ले रही है, ऐसे में कांग्रेस के हाथ क्या लगा? इसी नाराजगी के चलते कांग्रेस अब अपना अलग उम्मीदवार उतारने पर विचार कर रही है।
उद्धव ठाकरे का दांव: अंबादास दानवे ही क्यों?
उद्धव ठाकरे का कार्यकाल 12 मई को समाप्त हो रहा है। उन्होंने अपनी जगह दानवे को चुनने के पीछे कई रणनीतिक कारण बताए हैं:
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निष्ठा का ईनाम: अंबादास दानवे 2022 के शिवसेना विभाजन के बाद भी उद्धव ठाकरे के साथ मजबूती से खड़े रहे। वे मराठवाड़ा क्षेत्र के बड़े नेता हैं और परिषद में नेता प्रतिपक्ष (LoP) के रूप में आक्रामक रहे हैं।
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संवैधानिक मजबूरी नहीं: 2020 में मुख्यमंत्री बने रहने के लिए उद्धव ठाकरे का सदन का सदस्य होना अनिवार्य था, लेकिन वर्तमान में उनके पास ऐसी कोई राजनीतिक बाध्यता नहीं है।
सीटों का गणित और 'क्रॉस वोटिंग' का खतरा
महाराष्ट्र विधानसभा के मौजूदा संख्याबल के आधार पर विपक्षी गठबंधन (MVA) केवल एक सीट जीतने की स्थिति में है।
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जीत के लिए वोट: एक उम्मीदवार को जीतने के लिए 29 वोटों की आवश्यकता है।
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MVA की ताकत: शिवसेना (UBT) के पास 20 और शरद पवार की एनसीपी के पास 10 विधायक हैं (कुल 30), जो दानवे की जीत सुनिश्चित करने के लिए पर्याप्त हैं।
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पेच: यदि कांग्रेस अपना अलग उम्मीदवार उतारती है, तो चुनाव की स्थिति बनेगी और सत्ताधारी 'महायुति' गठबंधन इसका फायदा उठाकर 'क्रॉस वोटिंग' के जरिए विपक्षी एकता को नुकसान पहुँचा सकता है।
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