राजनीतिक लाभ के लिए आनन-फानन में किए जा रहे इस शिलान्यास ने जनता को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि यह विकास सचमुच जनता के लिए है या फिर केवल कॉरपोरेट घरानों को फायदा पहुंचाने का एक और जरिया है।

KEVAL KRISHNA TRIPATHI
विशेष संवाददाता
भोपाल, 5 जुलाई, 2026। मध्य प्रदेश सरकार और कॉरपोरेट जगत मिलकर शिवपुरी में ₹2500 करोड़ की लागत से अडानी समूह के अत्याधुनिक डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग प्लांट का शिलान्यास करने जा रहे हैं। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव और केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया आज रविवार को इसका भूमिपूजन करेंगे। सरकार इसे 'आत्मनिर्भर भारत' और 'मेक इन इंडिया' की दिशा में एक बड़ी उपलब्धि बताकर प्रचारित कर रही है। लेकिन इस चकाचौंध के पीछे शिवपुरी की जनता और पर्यावरणविदों के मन में कई गंभीर सवाल और आक्रोश पनप रहा है।

खोखले साबित न हो जाएं रोजगार के वादे

सरकार का दावा है कि इस भारी-भरकम निवेश से स्थानीय युवाओं को रोजगार मिलेगा और एमएसएमई (MSME) सेक्टर को बढ़ावा मिलेगा। लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग जैसे बेहद तकनीकी क्षेत्र में उच्च कुशल (High-skilled) इंजीनियरों और विशेषज्ञों की जरूरत होती है। शिवपुरी और आसपास के ग्रामीण इलाकों में तकनीकी शिक्षा और कौशल विकास की भारी कमी है। ऐसे में आशंका जताई जा रही है कि स्थानीय युवाओं को केवल सुरक्षा गार्ड या चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी जैसे कम वेतन वाले पदों पर ही रखा जाएगा, जबकि मुख्य नौकरियां बाहरी लोगों के खाते में चली जाएंगी।

पर्यावरण और अभयारण्य पर मंडराता खतरा

शिवपुरी अपनी प्राकृतिक सुंदरता, जंगलों और माधव राष्ट्रीय उद्यान (Madhav National Park) के लिए जाना जाता है। रक्षा उत्पादन से जुड़े भारी उद्योगों की स्थापना से क्षेत्र के नाजुक पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem) को अपूरणीय क्षति पहुंचने का खतरा है। स्थानीय पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने चेतावनी दी है कि कारखाने से निकलने वाले कचरे और रासायनिक प्रदूषण से वन्यजीवों का निवास स्थान प्रभावित होगा। पानी की भारी खपत के कारण पहले से ही जल संकट से जूझ रहे शिवपुरी में भूजल स्तर और नीचे गिर सकता है।

जमीन अधिग्रहण और छोटे उद्योगों की अनदेखी

परियोजना के लिए बड़े पैमाने पर जमीन के आवंटन को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। स्थानीय किसानों को उनकी उपजाऊ जमीन से बेदखल किए जाने का डर सता रहा है। दूसरी ओर, सरकार ₹211.29 करोड़ के जिन विकास कार्यों के लोकार्पण और भूमिपूजन का ढिंढोरा पीट रही है, वे लंबे समय से लंबित पड़े थे। क्षेत्र के छोटे और मध्यम उद्योग (MSME) पहले से ही मंदी और सरकारी उदासीनता की मार झेल रहे हैं। उन्हें सप्लाई चेन से जोड़ने का वादा केवल कागजी नजर आता है, क्योंकि कॉरपोरेट कंपनियां आमतौर पर अपने स्थापित वेंडर्स को ही तरजीह देती हैं।

राजनीतिक लाभ के लिए आनन-फानन में किए जा रहे इस शिलान्यास ने जनता को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि यह विकास सचमुच जनता के लिए है या फिर केवल कॉरपोरेट घरानों को फायदा पहुंचाने का एक और जरिया है।