सदगुरू हमें अपने आत्म स्वरूप का बोध कराते है, गीता महोत्सव का हुआ समापन / Madhya_Pradesh

सदगुरू हमें अपने आत्म स्वरूप का बोध कराते है, गीता महोत्सव का हुआ समापन

 

@lionnews.in

सिवनी। गुरू रूपी वैद्य अपनी वाणी रूपी ओैषधि से हमें मोह -शोक राग - द्वेष के रोगो से मुक्ति दिलाते है महापापी व्यक्ति भी ज्ञानी रूपी नौका में बैठकर पाप रूपी सागर के पार हो जाता है यज्ञ की ज्ञान अग्रि में हमारे संचित , प्रारब्ध और आगामी तीनों प्रकार के कर्म भस्म हो जाते है और पाप पुण्य से रहित व्यक्ति मुक्ति का अधिकारी होता है श्रद्धावान ज्ञान पिपासु और इंद्रियों को वश में करने वाले व्यक्ति को ही तत्व ज्ञान की प्राप्ति होती है भारतवर्ष में त्याग की महिमा सर्वश्रेष्ठ है उक्ताशय के उद्गार अनंत श्री विभूषित जगतगुरू शंकराचार्य स्वामी स्वारूपानंद जी महाराज के विशेष कृपा पात्र शिष्य गीता मनीषी ब्रह्मचारी निर्विकल्प स्वरूप जी ने गीता पराभक्ति मंडल के तत्वाधान में सूर्यवंशी कालोनी परतापुर रोड भैरोगंज में आयोजित 8 दिसंबर से 12 दिसंबर पंचदिवसीय श्रीमत भागवद गीता संत्संग महोत्व में प्रकाशित किया। पंचदिवसीय गीता सत्संग के समापन दिवस की प्रवचन माला में ब्रह्मचारी जी ने पूर्व दिवस के प्रसंग का स्मरण कराते हुये कहा कि संसार में अनेक प्रकार के भौतिक एवं आध्यात्मिक यज्ञों का वर्णन वेद शास्त्रों में मिलता है।.

      इन सभी यज्ञों में ज्ञान यज्ञ सर्वश्रेष्ठ यज्ञ माना गया है देव यज्ञ कर्मयोगियों द्वारा, ब्रह्म यज्ञ में विरक्त ज्ञानियों द्वारा, श्रोतादि पंच ज्ञानेन्द्रियों को संयम रूपी अग्रि में होम किया जाता है , गृहस्थों द्वारा शास्त्रोक्त विषयों को ही ग्रहण किया जाता है एक बार समाधि लगाकर ब्रह्म के दर्शन अवश्य करना चाहिये इसे सहज समाधि कहा गया है स्वध्याय यज्ञ, ज्ञान यज्ञ तथा योग साधना भी यज्ञ के प्रकार है यज्ञ से प्राप्त अवशिष्ठ ही अमृत कहा जाता है प्रसंगवश ब्रह्मचारी जी ने कहा कि हमें भगवान को अर्पित करके ही भोजन ग्रहण करना चाहिये इससे अन्न का दोष नहीं लगता तथा बुद्धि शुद्ध होती है।  सत्संग महोत्सव के समापन दिवस पर श्रोताओं से खचाखच भरे आयोजन स्थल में प्रवचन करते हुये ब्रह्मचारीजी ने गीता में वर्णित ज्ञान का सरल अर्थ करते हुये बताया कि भगवान प्राप्ति हेतु अज्ञान रूपी नशा को उतारना चाहिये इसका उपाय यज्ञ करना है इस तरह से भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को उपदेश करते हुये कहते है कि हे अर्जुन अपने शोक और मोह को त्याग  करके युद्ध के लिये खडे हो जाओं

       सैकड़ो की संख्या में उपस्थित श्रद्धालुओंजनों के साथ ही गुरू परिवार के प्रशांत तिवारी, रविकांत पांडेय, पं. आलोक दुबे, करतार सिंह बघेल, अजय वर्मा, राम तिवारी, विजेन्द्र तिवारी, आशादेवी सनोडिया, ताराचंद मिश्रा, जयश्री बघेल, कुमारी गरिमा तिवारी आरती मिश्रा, श्रीमती अंजली सुदेश देवकते, राजकुमारी बघेल, सरिता आंधवान, सहजकुमारी उपाध्याय, राजकुमरी दुबे, संतोष उपाध्याय बालगोविंद ठाकुर, श्रीमती मधु रमेश तिवारी, आदि ने समस्त श्रद्धालुओ की ओर से कथा के अंत में आरती पूजन में भाग लिया और पंच दिवसीय गीता महोत्सव का समापन किया

 

/ Madhya_Pradesh      Dec 13 ,2019 15:14