डाकू जिंदा है, लूट का सिर्फ स्टाइल बदला / Madhya_Pradesh

डाकू जिंदा है, लूट का सिर्फ स्टाइल बदला

ददूआ, रामबाबू, मान सिंह, पान सिंह तौमर, जैसे कई डाकू चंबल की बीहड़ से ही निकले है। इतिहास बताता है इस जगह का पानी ही कुछ ऐसा है कि यहा बगावत पनपती है। यहा घर घर में डाकू तो घर घर में पुलिस बाले भी मिलेगेंं। चम्बल की इस मिटटी ने डाकू दिये तो भारत को सेनिक भी दिये है। ये बात ओर है कि समाज और पुलिस से बगावत करके कुछ लोग डाकू बने। 

हम बात कर रहे है डाकू की जो आप को बता दे डाकू जो लूटता था उसको एक बड़ा हिस्सा वह समाज के उस वर्ग पर लगाता था जो गरीब और लाचार है। वह अमीरो को लूटता था लेकिन गरीबों पर लूटाता था। डाकूओं की एक बड़ी खासियत यह रही कि वह जहा रहते थें। उस जगह से 10 10 कोस दुर तक सबको खुश रखते थें। किसी गांव में बच्ची की शादी हो तो व्यवस्था का खर्च उठाना, कभी कुछ आपदा आ जाये तो राहत देना। मदद के लिये दोनों हाथ खुले रखना। जितना उनसे होता उससे ज्यादा करने की कोशिश करते थे। यही कारण था कि पुलिस उन तक कभी पहुच ही नहीं पाती थी। पुलिस की छापा मारी से पहले ही उनको आस पास के लोग खबर पहुचा दिया करते थे। उनके लूटने का तरीका और डर दिखाने का तरीका कुछ ऐसा था कि घोड़ा पर आना, हमेशा 10 से अधिक साथीयों के साथ जगह पर पहुचना। कुछ इससे मिलता जूलता वातावर्ण वह तैयार करते थे। अब बात करे आज के डाकू की पिछले 15 साल में डाकू ने अपना स्टाइल बदल लिया। अब सफेद कपड़ों में आना घोड़ों की जगह लगजरी गाड़ीयों ने ले ली। गरीब के घर में शादी कराने से लेकर स्वास्थ ठीक कराने का जिम्मा भी इनका हो गया। मंच से सपने दिखाना। घोषणवीर बने रहना। लूटने के साथ साथ रिश्ता तक जोड़ने में पीछे नहीं हटते। कभी मामा तो कभी बहनों के भाई बनना इनकी खास पहचान हो चली है। भाई तो बन जाते लेकिन बहनों को सुरक्षा देने में पीछे हट जाते। हा लूटने का तरीका ऐसा की पुलिस तो दुर काई जांच एंजेशी तक उनके पास पहुच ही नहीं सकती। अब डाकूओं ने खुद के डम्पर, खुद की डेरी, और खुद की फेक्टरी, सहित फार्म हाउस तक बना लिये फर्क इतना कि डाकू ने अपने आप को नेता बना लिया। डाकू तो अभी भी जिंदा है। और हमे कई सालों से लूट रहे है। 

किसी की भावनाओं को ठेस पहुचाना हमारा उददेश्य नहीं है। यह लेखक की राय है

/ Madhya_Pradesh      Apr 23 ,2019 17:07