बेहतर प्रदर्शन की उम्मीद ने,  कांग्रेस बसपा के गठबंधन के बीच फंसा रखा  है पेंच Bhopal / Madhya_Pradesh

बेहतर प्रदर्शन की उम्मीद ने, कांग्रेस बसपा के गठबंधन के बीच फंसा रखा है पेंच

 
@lionnews.in
सचिन गंगराड़े ,
भोपाल। भाजपा को हराने के लिए उत्तरप्रदेश एवं कर्नाटक जैसी विपक्ष की एकता मध्यप्रदेश के विधानसभा चुनाव में अभी तक परवान नही चढ़ी है। इसके पीछे का कारण प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस और बसपा के बीच सीटों के बंटवारे को लेकर मची रस्साकसीं है। कांग्रेस को मौजूदा चुनाव में जहां एंटीएनकम्बेंसी के दम पर अपने 15 वर्षों के वनवास के समाप्त होने के पुरे आसार दिख रहे है, वही विगत माह हुए दलित आंदोलन के कारण बहुजन समाज पार्टी की बांहें खिली हुई है। इस कारण बसपा औऱ कांग्रेस की ओर से अधिक से अधिक सीटों पर ताल ठोंकी जा रही है।
 
वोटों के बटवारे को रोकना भी जरूरी 
भाजपा को चौथी बार मध्यप्रदेश की सत्ता में आने से रोकने के लिए विपक्षी दलों के बीच वोटों के बटवारे को रोकना भी कांग्रेस की पहली चुनौती है। विगत चुनाव में कांग्रेस को लगभग 37 फीसदी ,बसपा को 6 फीसदी, वाममोर्चा को 3 फीसदी व अन्य विपक्षी दलों को लगभग 3 फीसदी वोट प्राप्त हुए थे। इन वोटो का शेयर सत्तादारी भाजपा को मिले 45 फीसदी वोटो से अधिक है। इसे रोकने के लिए कांग्रेस के जिम्मेदार बार बार गठबंधन की बात दोहरा जरूर रहे है,लेकिन अभी तक इसकी खुलकर वकालत न आलाकमान की ओर से हुई है ना प्रदेश संगठन की ओर से। 
 
मप्र में बदले समीकरण इसलिए बसपा के भी जागे अरमान
 
उत्तर प्रदेश में विगत माह हुए लोकसभा उपचुनावों में भाजपा को हराने के लिए बसपा ने लगभग ढाई दशक पुरानी दुश्मनी भुलाकर बिना कोई कठिन शर्त के सपा से हाथ मिलाया था, लेकिन मप्र में कांग्रेस से गठबंधन को लेकर उसके तेवर बदलें हुए है। इसका कारण प्रदेश सरकार के खिलाफ विगत अप्रेल माह में हुआ दलित आंदोलन है। इस आंदोलन ने बसपा के भी अरमान जगा दिए है। पार्टी की मंशा उत्तरप्रदेश से सटे जिलों में सरकार के खिलाफ दलितों के इस विरोध को मौजूदा चुनाव में पूरी तरह भुनाने की है। उत्तरप्रदेश  की सीमा से सटे होने के कारण प्रदेश के बुंदेलखंड , चम्बल एवं विंध्य क्षेत्र के जिलें बहुजन समाज पार्टी के प्रभाव वाले क्षेत्र रहे है। बसपा को भाजपा विरोधी इन वोटों के सहारे इन क्षेत्रों  की लगभग 12 से 15 सीटें जीतने की पूरी उम्मीद लग रही है। चुनाव के बाद यह सीटें सरकार बनाने मे निर्णायक साबित हो सकती है। ऐसे में बसपा की मंशा भी अपनी शर्तों पर ही गठबंधन करने की है।
 
 तीसरी ताकत के खड़े होने की भी चिंता
मध्यप्रदेश की राजनीति शुरू से ही कांग्रेस ओर भाजपा के बीच घूमती रही है। प्रदेश का दलित वोट अभी तक इन्ही दोनो दलों तक सीमित रहा है। इसलिए तीसरी पार्टी के रूप में प्रदेश स्तर पर खड़े होने का मौका बसपा को कभी नही मिला है। गठबंधन होने से प्रदेश में तीसरी ताकत के रूप में सपा विशेषकर बहुजन समाज पार्टी के खड़े होने की संभावनाएं बढ़ जाएगी। इसका सबसे ज्यादा नुकसान कांग्रेस को ही होने वाला है। इसलिए भी कांग्रेस मध्यप्रदेश में गठबंधन को लेकर फूंक कर ही कदम रख रही है ।

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Bhopal / Madhya_Pradesh      Jun 12 ,2018 05:47