डर का बंद ,दलित दंग. . . / Madhya_Pradesh

डर का बंद ,दलित दंग. . .

लेखक - सत्येन्द्र जैन  

फेस बुक और व्हाटसएप चले साये के तले कभी दुर्दांत बागी के नाम से कुख्यात ग्वालियर-चबंल अंचल के सबसे बडे नगर ग्वालियर , भिंड जिले के कस्बों लहार,रौन, मछंड,गोहद,मेहगांव,गोहद से मुरैना के पोरसा,अंबाह,से लेकर कैलारस ,जौरा,सबलगढ के साथ-साथ डबरा जैसे कस्बों में मुकम्मल बंद रहा। बंद की खास बात तो यह रही आम आदमी से लेकर संभाग के प्रशासन के आला अफसरों, पुलिस विभाग के आई जी ,डीआई से लेकर जनता के चुने जनप्रतिनिधियों के मन में स्वस्फुर्त बंद का भय इस कदर पैठ चुका था। कि वो कोई भी बंद पर प्रतिक्रिया देने के बजाय कैसे भी बंद को सफल बनाकर अपनी साख बचाने की जुगाड में जुटा था।

 

              जहां तक बंद में अंचल के व्यापारियों और आम जन की भूमिका महज मूक दर्शक की रही । उसने तो गत 2 अप्रेल को   हरिजन-आदिवासी निरोधक कानून में हुए बदलाव के विरोध में प्रदर्शन कर रहे बंद के विरोध में उतरे बाहुवलियों के गोली चलाने से  निरीह लोगों की हत्याओं और एक सप्ताह  लगातार कर्फ्यू के साये में भय और भुखमरी की कगार पर पहुंच। चुके अंचल के आम आदमी ने रोज रोज के क्लेश से निजात पाने की गरज से  मंगलवार के बंद के दिन घर में रहना मुनासिब समझा। मंगलवार कराये गये  बंद पर समाज का बाहुबली तबका भले ही स्वंय की पीठ ठोकर कर अपने के गौरवान्वित अनुभव करे। वहीं दूसरी ओर 2 अप्रेल के बंद के दौरान भीड के सामने  सर पैर रखकर भागे जिलाधीश राहुल जैन मंगलबार के बंद में रही शांति

 

पर अपने को सफल प्रशासक मान ले ,लगभग यही शब्द पुलिस अधीक्षक आशीष कुमार पर लागू होते है। कि वे 2 अप्रेल को दलितो के बंद में बाहुवलियों के बेवजह किये प्रतिरोध के रोकने और  महानगर के मुरार उपनगर में हुई दो दलितों की हत्या के बाद उपजे आक्रोश का नियंत्रित करने में पूरी तरह असफल रहे हैं। वहीं सैकडों दलितों की  महानगर के साथ साथ अंचल के भिंड मुरैना के गांव देहातों से की गई धडाधडा  गिरफ्तारियों से ये साफ हो गया है कि प्रशासन और जनता के चुने सांसद और विधायक आज भी महज दो जातियों के उंगलियों पर नाचने वाली कठपुतली साबित हुए हैं।

  अगर लोकसभा में बैठे तीनों सांसदों की बात करे तो भाजपा का  केन्द्रीय मंत्रीमंडल मे प्रतिनिधित्व कर रहे नरेन्द्र सिंह तोमर,दबंग छवि रखने वाले  मुरैना के सांसद अनूप मिश्रा या भिंड के भागीरथ प्रसाद हो  एक ने गत सात दिनों में अपने बंगलों   से निकल कर  2 अप्रेल के बंद में मारे गये आधा दर्जन  दलित परिवारों के बीच जाकर उनके आंसू  पोछने की जहमत उठाई। आधे अधूरे मन से महज प्रदेश सरकार की मंत्री माया सिंह को दलितों  के बीच भेजकर  साख बचाने की कोशिश भर की है।  ऐसा ही कांग्रेस की ओर से  भिंड में शांति प्रयास करने उतरे लहार विधायक और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता गोविंद सिंह भी दलितों की सरपरस्ती करने के बजाय दबंगों को पुलिस के कोप से बचाने की कोशिश करते दिखे। प्रदेश की  सत्ता में वापसी का स्वप्न देख रही कांग्रेस की भूमिका भी संदेहस्पद रही है। कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अरुण यादव ,नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह, उपनेता बाला बच्चन ,युवा नेता जीतू पटवारी  में से एक ने भी बंद के दौरान  ग्वालियर-चबंल अंचल में मारे  गये  आधा दर्जन दलितों के परिजनों के बीच आकर आंसू पोछने आने के बजाय  पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह की नर्मदा यात्रा समाप्ति के बरमान भंडारे में जाकर प्रसाद चखना ज्यादा अहम समझा।

 

                 विधानसभा आम चुनाव से महज छह माह पूर्व एक सप्ताह के अंतराल में हुए बंदों ने समाज के बाहुवली तबके और दलितों के बीच स्पष्ट विभाजन कर दिया है।  सत्ता पर 15 बर्षो से काबिज भाजपा और सत्ता पाने  को लालायित विपक्षी दल  कांग्रेस की संदिग्ध भूमिका ने अंचल के दलित मतदाताओं  के मन जो खटास पैदा की है  जिसकी धमक आने वाले विधान सभा और 2019 के लोकसभा चुनाव में दिखेगी।

लेखक - सत्येन्द्र जैन 

नोट- लेखक के स्वयं के विचार है। लॉयन न्यूज उनके  विचारों से इतिफाक नही रखता

/ Madhya_Pradesh      Apr 12 ,2018 15:07